Sunday, October 25, 2009

अब के ये रैना...

अब के ये रैना गुजरें नहीं है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है

कोई उन्हें कहे यादों को न भेजे हमे
गुस्ताख होती है ये बेचैन करे हमें
ये जो आये तो नींद को निगले है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है

इनके सताए जो, तकदीर के आतीत बने है
गिरफ्त से छूटे जो, मौजों के मौला बने है
आना-जाना इनका, जीवन को कतरे है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है

सैनपाल 'साथी'

5 comments:

  1. बहुत बढिया शैली पसंद आई,आगे भी लिखे,
    आप का स्वागत करते हुए मैं बहुत ही गौरवान्वित हूँ कि आपने ब्लॉग जगत में पदार्पण किया है. आप ब्लॉग जगत को अपने सार्थक लेखन कार्य से आलोकित करेंगे. इसी आशा के साथ आपको बधाई.
    ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं,
    http://lalitdotcom.blogspot.com

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  2. बहुत अच्छा लेख है। ब्लाग जगत मैं स्वागतम्।

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  3. अच्छा लिखा और अच्छा लिख सकते है ।
    शुभकामनाएं ।

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