कोई फरियाद करें भी तो किस हुजुर में
यहाँ कातिल ही कुर्सी पर बदले हुए भेस में
सोचा था पूछेंगे हर हिसाब इश्क-ए-गुमराह का
अब हम ही मुव्किल थे खड़े किये कटघरे में
ढका हुवा था हर चेहरा ओढे हुए नकाब में
छिपा गर है हर मोहरा क्या जीते शतरंज में
नासूर बन गया था जख्म बारी-बारी के कुरेद में
अब सूली पर लटके हुए थे फरेबी के इल्जाम में
सैनपाल 'साथी'
Sunday, October 25, 2009
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