हे राम
बस इतना बता दे
कौन अपना है
गैर कौन है
मुद्दतों से जो कहते है मेरे अपने है
नामों निशान तक न रखने के खल करते है
सच कहता हूँ इसे से दिल को पल पड़ते है
हमें उस आयाम पे देखना रास न आया उन्हें
तनहा रुह तनहा जिगर खून भरे सिलें मिले
हमें उनकी झेलने की अदा ने कायल किया है
हद से ज्यादा जज्बात ने घायल किया है
धीमी धीमी चुभन को नजर अंदाज़ जो किया हमने
बैद्य ने क्या खूब कहा बगल में गढा छुरा पाया है
कैसे हम किसी पर शक करे
सभी तो अपने ठहरे गैर किसे करें
हे राम
फिर सवाल किये जा रहा हूँ तुम से
मनुष्य इतना जले क्यूँ है मन से
क्या इस कमी को
अगले उत्क्रांत में उकड नहीं सकतें जड़ से
कायदे कानून से जुडी मनुष्य जात
प्रकृति के नियमों को भूली तो नहीं
जो बड़ा, खडा हो जाये दूसरों के सीने पर
तो इन्सान अलग कैसे जानवर जात से
आये दिन वारदात होते रहते है
हर कोई हर एक का हक़ छिनते रहतें हैं
मैं हिन्दू, मैं मुसलमान तो कोई शिख ईसाई है
हे राम
क्या ये सब इन्सान नहीं है
एक दूजे के अपने नहीं है
सैनपाल 'साथी'
Sunday, October 25, 2009
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