हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
कोई गम नहीं, जमाना जो हमें गुनाहगार कहे
देखा जब उस हसीना को, संवर रही थी आईने में खुद को
मुंदी पलके, महके गुसू, सुर्ख लबों के लगे कुछ हिले हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
पलट चुकी थी लीए अंगडाई, नजरें मिली थी शामत आई
हलकी मुस्कान जैसे दिल पे दस्तक थी और अरमां जगे हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
वो ही नहीं कायनात भी दिल पर हावी थी
चल रही थी कुछ ऐसी पुरवाई, दिल के काबू ढीले हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
सैनपाल 'साथी'
Sunday, October 25, 2009
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