Friday, October 23, 2009

शै-ए-नैन की...

शै-ए-नैन की जो बात होती है
हुर का नूर दिल का सुरूर याद आतें है

आंखे है या मै के प्याले भरें
चारो सू लगे है पहरें
डूबे जो इनमे नस्फ़-शब के महताब याद आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है

तेरी पलकों के सायें में छिपे अस्म कई
तेरी अश्क ने सिखाएं है इल्म कई
गिरे जो इनसे दिन में अंजुम नजर आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है

मौसम जो खुश्क हुए
नैन में काजल नजर आता है
फिजाओं में जो रज घुल गए
अखियों में बादल नजर आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है

चंचल है नैन तेरें की मिजजें फर्क
हर उठी नजर में मेरे कई कद नजर आतें है
आँखों के नूर में मन के दरश याद आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
हुर का नूर दिल का सुरूर याद आतें है

सैनपाल 'साथी'

No comments:

Post a Comment