Sunday, October 25, 2009

दिल-ए-दर्पण है ..

दिल-ए-दर्पण है संभालिए, शीशे सा अंजाम न देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना

बे-जिगर सीना जैसे शराब बिन सागर होता है
अचेत शख्श जैसे रूह बिन जिस्म होता है
सजा देने में है रुसवाई यूँ नादानी का इल्जाम न लेना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना

मैं तुझे ऐसा प्यारा जैसे शमा को हवा होती है
तू मुझे ऐसी प्यारी जैसे प्यासे को जल होता है
भरम इस इख्तियार का कभी होने आम न देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना

एक ही से जो माहोल बने हजारों से ओ संभल न पाओगे
हर टुकडा है अब मेरे जैसा मुझे हजारों में बटा शामिल पाओगे
दिल न तोड़ो शीशे जैसा मुश्किल हादसा है भुला देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना

सैनपाल 'साथी'

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