Sunday, October 25, 2009

दाग जो तेरें आस्तीन के...

हर कोई ये कहेगा कि हम ही तेरें काबिल न थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे

सुना था सागर सी गहरी जनानत, तुने कश्म-कश पाले थे
भेद भी आपसी जो तुने लबों से गिराए थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे

दबी दबी सी बातें हर महफ़िल में, तेरी अगुवाई के राग थे
उमीदों के घरौंदें जो तुने खुद हांथों से जलाये थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे

अबकी हर रंज गरीबाँ में बैठा है, ऐतबार न जूठा पाए थे
टूटे सपनों के बहाव में रश्मो-रिश्तों के मलबे बहे पाए थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे

दिल में थी कशिश गर हर जहर को उगल देती, मेरे दर तो खुले थे
तेरे आंसू यूँ जाया करते, हम इतने भी संगदिल न थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे

सैनपाल 'साथी'

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