Friday, October 23, 2009

बाँहों में सिमट लेना...

जिंदगी, बाँहों में सिमट लेना अब जिया न जाये
न कस आगोश में यूँ हमें कि दम निकल जाये

हो गयी बौछारें बादल गरजतें बरसतें रहे
ठिठक रहे हैं ठण्ड से कि नब्ज न जमी रहे

याद न किया रब को अब मन ही मन शरमायें
गिरे है बिजली जो, साँसों तले बुझतें शोलें पाए

उड़ कर चाँद छुने कि कोशिश में होश न रहे
फिर भी न मालूम हुई अपनी उडानों कि सीमाएं

संभल रखे है कई अफताब कि राहें रोशन हो जायें
जो किये है मकाम हासिल अब मन को न बहलाए

सैनपाल ' साथी'

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