बड़े अर्से से उनका पैगाम आया है
कहाँ रखा था वो जाम याद आया है
सोचा न था कभी उनको भी याद आएगी
बहुत दिन हुए बिझाली नही गिरी थी
उभरे नही है जलते मंजर से
देखे है जां बाकी है या रहा साया है
कहाँ रखा था...
झुल्फों की घटाओं में गुप्त कर दिया हमें
नजरों में कैद कत्ल कर डाला हमें
क्या हुआ जालिम खुनें- आंसू रोया है
अँखियाँ तरसती यादें कलश न बहाया है
कहाँ रखा था...
आज मैखाने खाली नही होंगे मैकाशों की भीड़ में
दिल का खालीपन डुबो-डुबो कर भरेंगे जाम में
कितने दिन पीती थी मुझे,तरस नही खायेंगे जाम पर
नशें-अंजुमन में चलें 'साथी' सारी रात बाकी है
कहाँ रखा था..
सैनपाल 'साथी'
Friday, October 23, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment