तेरा वापस न आना गर तय था
तो लम्हें-इंतजार का अफसोस न होता
दिल में क्या था गर मालूम होता
तो इतने दिन जाया किए, गम न होता
पंखडियों में बंध होने का एहसास भी होता
तो यूं पहलू में आने की कोशिश न करता
गेसुओं के उलझाव ने यूं आँखों में अँधेरा न भरा होता
तो दिल पे किए सितम का दर्दें-एहसास न होता
सालों गुजर जातें हैं एक मुलाकात के बाद गर
तो दोस्तों के हांथों पैगाम न भेजता
कल तू वादों पे कायम रही होती तो
आज मेरी जिंदगी में कुछ तो बदलाव होता
सैनपाल 'साथी'
Friday, October 23, 2009
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