जिया हूँ अब तक तुझे, ए जिंदगी
बता ये जीनत तुझे कैसी लगी
तराशी है जो वजूदे सूरत, ए जिंदगी
बता ये मूरत तुझे कैसी लगी
जिस तकदीर में बहारें थी
उसी का हो जाना नागवार था
जर्रा-जर्रा वीरां दिल
हर मायूस उमीद का सोगवार था
रूह मेरी जो खरीद सके
ऐसा कोई जमीरदार न था
अब थी बहारों की इल्तिजा, ए जिंदगी
बता ये रु-ब-रु तुजे कैसी लगी
जिया हूँ अब तक…
चंद सांसों के कतरें सही,
सांचा-ए-फितरत में न ढलें है अभी
गिरफ्त में ले ले जो दस्तुरें हालत,
न थे हावी हम पर कभी
तनहा थे तनहा रहेंगे,
दुनिया से अलग कलंदर है अभी
माना की दुनिया बदल न सके, ए जिंदगी
बता ये उन्वान तुजे कैसी लगी
जिया हूँ अब तक…
सैनपाल 'साथी'
Sunday, October 25, 2009
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