काँटों से दमन तोड़ते है सभी, हैरत तो नहीं
हम तो काँटों के लिए ही बने उनसे गैरत नहीं
इंतजार में नैन गढे तुम नजर आओगी कही
इतना तो बता के जाती सावन आने को नहीं
हम साहिल जो ठहरे लहरों की टकरें सही
अब के बिछुडे तो मिलने की उमीदें है नई
चुपचाप से अनजान चेहरों में नजर तुम्हे ढूँढती रही
फिर न मिलियत की चुभन से अश्क बार होती रही
जान चूका है राज-ए-मोहब्बत ये गली मोहल्ला, ओ हरजाई
उठेंगी कई उंगलिया तेरी तरफ नामें बेवफाई
दाग दामन पर लगे और नजरें जो मैली हुई
हमने तो कब की दुनिया छोड़ी खाक लाश ही रही
सैनपाल 'साथी'
Friday, October 23, 2009
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