बेदिली से निकाल फेंके है शाखे-नौ-खेज को इन्हें
शजर से लिपटी बेले समझे हो, जो बंधे रखे है तुम्हे
ये हवा गुनगुनाती है, या सबे-बर्ताव दोहराती है
आप तो जाने है ये जुबां, किस बात की कसर है
सरे बाजार रुसवा किये हो, ऐसी छुरियां कब परजे हो
बेकसी की हर शाम पर, खलवते-जाम बक्शे जा रहे हो
पतझड़ में हूँ, हड्डियों के पिंजर से लटका है सुखा गरीबाँ
न हवा, न पानी न उजालें है, सावन को वश किये बैठे हो
सैनपाल 'साथी'
Tuesday, October 27, 2009
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