उफ़! बेवफाई के खुदा कुछ तो रहम बरफा
लुट चूका हूँ,अब भी कुछ बचा है मेरी तरफा
वो मुझ पर छाए जैसे धरती पर काली घटा
कहर में डूबा हुवा हूँ, कुछ तो रहम बरफा
मिलने का वादा करके वो हवा से हो गए है
पत्थर बनी है आंखें, कुछ तो रहम बरफा
हर तरफ जलवे और रानाइयां मौजूद है
तकदीर है शबे-गम, कुछ तो रहम बरफा
नसीब में थी इतनी खुशी कि झोली भर गयी थी
दूजे पल का हूँ दाईम, कुछ तो रहम बरफा
वो मेहरबां नजर दिल फिर हराभरा करे
जुबां पर जफा है 'साथी', कुछ तो रहम बरफा
सैनपाल 'साथी'
Tuesday, October 27, 2009
बेदिली से निकाल फेंके...
बेदिली से निकाल फेंके है शाखे-नौ-खेज को इन्हें
शजर से लिपटी बेले समझे हो, जो बंधे रखे है तुम्हे
ये हवा गुनगुनाती है, या सबे-बर्ताव दोहराती है
आप तो जाने है ये जुबां, किस बात की कसर है
सरे बाजार रुसवा किये हो, ऐसी छुरियां कब परजे हो
बेकसी की हर शाम पर, खलवते-जाम बक्शे जा रहे हो
पतझड़ में हूँ, हड्डियों के पिंजर से लटका है सुखा गरीबाँ
न हवा, न पानी न उजालें है, सावन को वश किये बैठे हो
सैनपाल 'साथी'
शजर से लिपटी बेले समझे हो, जो बंधे रखे है तुम्हे
ये हवा गुनगुनाती है, या सबे-बर्ताव दोहराती है
आप तो जाने है ये जुबां, किस बात की कसर है
सरे बाजार रुसवा किये हो, ऐसी छुरियां कब परजे हो
बेकसी की हर शाम पर, खलवते-जाम बक्शे जा रहे हो
पतझड़ में हूँ, हड्डियों के पिंजर से लटका है सुखा गरीबाँ
न हवा, न पानी न उजालें है, सावन को वश किये बैठे हो
सैनपाल 'साथी'
Sunday, October 25, 2009
अब के ये रैना...
अब के ये रैना गुजरें नहीं है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है
कोई उन्हें कहे यादों को न भेजे हमे
गुस्ताख होती है ये बेचैन करे हमें
ये जो आये तो नींद को निगले है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है
इनके सताए जो, तकदीर के आतीत बने है
गिरफ्त से छूटे जो, मौजों के मौला बने है
आना-जाना इनका, जीवन को कतरे है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है
सैनपाल 'साथी'
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है
कोई उन्हें कहे यादों को न भेजे हमे
गुस्ताख होती है ये बेचैन करे हमें
ये जो आये तो नींद को निगले है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है
इनके सताए जो, तकदीर के आतीत बने है
गिरफ्त से छूटे जो, मौजों के मौला बने है
आना-जाना इनका, जीवन को कतरे है
खाक ऐसी याद कि बदरे हुई है
सैनपाल 'साथी'
जिया हूँ अब तक ...
जिया हूँ अब तक तुझे, ए जिंदगी
बता ये जीनत तुझे कैसी लगी
तराशी है जो वजूदे सूरत, ए जिंदगी
बता ये मूरत तुझे कैसी लगी
जिस तकदीर में बहारें थी
उसी का हो जाना नागवार था
जर्रा-जर्रा वीरां दिल
हर मायूस उमीद का सोगवार था
रूह मेरी जो खरीद सके
ऐसा कोई जमीरदार न था
अब थी बहारों की इल्तिजा, ए जिंदगी
बता ये रु-ब-रु तुजे कैसी लगी
जिया हूँ अब तक…
चंद सांसों के कतरें सही,
सांचा-ए-फितरत में न ढलें है अभी
गिरफ्त में ले ले जो दस्तुरें हालत,
न थे हावी हम पर कभी
तनहा थे तनहा रहेंगे,
दुनिया से अलग कलंदर है अभी
माना की दुनिया बदल न सके, ए जिंदगी
बता ये उन्वान तुजे कैसी लगी
जिया हूँ अब तक…
सैनपाल 'साथी'
बता ये जीनत तुझे कैसी लगी
तराशी है जो वजूदे सूरत, ए जिंदगी
बता ये मूरत तुझे कैसी लगी
जिस तकदीर में बहारें थी
उसी का हो जाना नागवार था
जर्रा-जर्रा वीरां दिल
हर मायूस उमीद का सोगवार था
रूह मेरी जो खरीद सके
ऐसा कोई जमीरदार न था
अब थी बहारों की इल्तिजा, ए जिंदगी
बता ये रु-ब-रु तुजे कैसी लगी
जिया हूँ अब तक…
चंद सांसों के कतरें सही,
सांचा-ए-फितरत में न ढलें है अभी
गिरफ्त में ले ले जो दस्तुरें हालत,
न थे हावी हम पर कभी
तनहा थे तनहा रहेंगे,
दुनिया से अलग कलंदर है अभी
माना की दुनिया बदल न सके, ए जिंदगी
बता ये उन्वान तुजे कैसी लगी
जिया हूँ अब तक…
सैनपाल 'साथी'
फरियाद करें भी...
कोई फरियाद करें भी तो किस हुजुर में
यहाँ कातिल ही कुर्सी पर बदले हुए भेस में
सोचा था पूछेंगे हर हिसाब इश्क-ए-गुमराह का
अब हम ही मुव्किल थे खड़े किये कटघरे में
ढका हुवा था हर चेहरा ओढे हुए नकाब में
छिपा गर है हर मोहरा क्या जीते शतरंज में
नासूर बन गया था जख्म बारी-बारी के कुरेद में
अब सूली पर लटके हुए थे फरेबी के इल्जाम में
सैनपाल 'साथी'
यहाँ कातिल ही कुर्सी पर बदले हुए भेस में
सोचा था पूछेंगे हर हिसाब इश्क-ए-गुमराह का
अब हम ही मुव्किल थे खड़े किये कटघरे में
ढका हुवा था हर चेहरा ओढे हुए नकाब में
छिपा गर है हर मोहरा क्या जीते शतरंज में
नासूर बन गया था जख्म बारी-बारी के कुरेद में
अब सूली पर लटके हुए थे फरेबी के इल्जाम में
सैनपाल 'साथी'
जब जब खुले आंख...
उल्फत तो है उनसे मगर वो मकाम चाहिए
जब जब खुले आंख तो वो सामने नजर आए
वो उनका तसव्वुर में सताना ख्वाबों के अरमां हो जाए
ए काश कि हर वो ख्वाब हकीकत में ढल जाए
जहाँ जाती है वो महफिलें जवां होती है
ए काश कि वो अहले करम हम पे भी हो जाए
उनकी याद में हम दिल का चैन खो दिए
अब वो ऐसी सदा दे कि दिल को सुकून मिल जाए
जब वो इतराके नाजें कदम चलतें गए
ज़माने के साथ साथ हमे भी दीवाना बनाते गए
जब वो सवरतें थे आइना भी झुका देखे है
ए काश वो हमपे भी एक नजर वारी हो जाए
या रब मेरी इस तड़पन पर उनका आना मरहम हो जाए
वरना इल्जाम तुझे भी देंगे कि उनको ये अंदाज दिए
सैनपाल 'साथी'
जब जब खुले आंख तो वो सामने नजर आए
वो उनका तसव्वुर में सताना ख्वाबों के अरमां हो जाए
ए काश कि हर वो ख्वाब हकीकत में ढल जाए
जहाँ जाती है वो महफिलें जवां होती है
ए काश कि वो अहले करम हम पे भी हो जाए
उनकी याद में हम दिल का चैन खो दिए
अब वो ऐसी सदा दे कि दिल को सुकून मिल जाए
जब वो इतराके नाजें कदम चलतें गए
ज़माने के साथ साथ हमे भी दीवाना बनाते गए
जब वो सवरतें थे आइना भी झुका देखे है
ए काश वो हमपे भी एक नजर वारी हो जाए
या रब मेरी इस तड़पन पर उनका आना मरहम हो जाए
वरना इल्जाम तुझे भी देंगे कि उनको ये अंदाज दिए
सैनपाल 'साथी'
दिल-ए-दर्पण है ..
दिल-ए-दर्पण है संभालिए, शीशे सा अंजाम न देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
बे-जिगर सीना जैसे शराब बिन सागर होता है
अचेत शख्श जैसे रूह बिन जिस्म होता है
सजा देने में है रुसवाई यूँ नादानी का इल्जाम न लेना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
मैं तुझे ऐसा प्यारा जैसे शमा को हवा होती है
तू मुझे ऐसी प्यारी जैसे प्यासे को जल होता है
भरम इस इख्तियार का कभी होने आम न देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
एक ही से जो माहोल बने हजारों से ओ संभल न पाओगे
हर टुकडा है अब मेरे जैसा मुझे हजारों में बटा शामिल पाओगे
दिल न तोड़ो शीशे जैसा मुश्किल हादसा है भुला देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
सैनपाल 'साथी'
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
बे-जिगर सीना जैसे शराब बिन सागर होता है
अचेत शख्श जैसे रूह बिन जिस्म होता है
सजा देने में है रुसवाई यूँ नादानी का इल्जाम न लेना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
मैं तुझे ऐसा प्यारा जैसे शमा को हवा होती है
तू मुझे ऐसी प्यारी जैसे प्यासे को जल होता है
भरम इस इख्तियार का कभी होने आम न देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
एक ही से जो माहोल बने हजारों से ओ संभल न पाओगे
हर टुकडा है अब मेरे जैसा मुझे हजारों में बटा शामिल पाओगे
दिल न तोड़ो शीशे जैसा मुश्किल हादसा है भुला देना
जुब जाए तुकडे जो हांथो में, फिर हमे इल्जाम न देना
सैनपाल 'साथी'
मिट गया है...
मिट गया है घाव पर जख्म अभी बाकि है
टूट गए है सब रिश्तें दोस्त रहा साकी है
छोड़ दिया था जिस मोड़ पर सब ने न रहा साथी था
होश कहाँ है दिन चले की रात अभी तक बाकि है
जिनके खातिर हमने सब कुछ का दाव लगाया था
हार गए है हम वो बाजी, ये खलिश अभी तक बाकि है
सैनपाल 'साथी'
टूट गए है सब रिश्तें दोस्त रहा साकी है
छोड़ दिया था जिस मोड़ पर सब ने न रहा साथी था
होश कहाँ है दिन चले की रात अभी तक बाकि है
जिनके खातिर हमने सब कुछ का दाव लगाया था
हार गए है हम वो बाजी, ये खलिश अभी तक बाकि है
सैनपाल 'साथी'
है किसने हम पे...
है किसने हम पे एहसान-ए-करम फरमाए
एक कमसिन शोख हसीना से टकरा गयी निगाहे
वाजिब न हुस्न जैसे शबाबे- धुमार क्या कहिये
तक़दीर कहू या खुदा मेहरबान वो पहलू में आये
चुनरी लहराई तो हवा ने सिख ली वो अदा
चोटी लहरे तो नागिन ने ले ली वो बलाए
आंखे ऐसी कोई अफसाना बेताब कहे
नजरें ऐसी दिल का हर चिलामन जला दे
वाकिफ है इशारत-ओ-सुए-हम खुद-ब-खुद संभालिए
वरना पता चलेगा हम तो बेमौत मारे गए
सैनपाल 'साथी'
एक कमसिन शोख हसीना से टकरा गयी निगाहे
वाजिब न हुस्न जैसे शबाबे- धुमार क्या कहिये
तक़दीर कहू या खुदा मेहरबान वो पहलू में आये
चुनरी लहराई तो हवा ने सिख ली वो अदा
चोटी लहरे तो नागिन ने ले ली वो बलाए
आंखे ऐसी कोई अफसाना बेताब कहे
नजरें ऐसी दिल का हर चिलामन जला दे
वाकिफ है इशारत-ओ-सुए-हम खुद-ब-खुद संभालिए
वरना पता चलेगा हम तो बेमौत मारे गए
सैनपाल 'साथी'
हो गयी मुहब्बत तो...
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
कोई गम नहीं, जमाना जो हमें गुनाहगार कहे
देखा जब उस हसीना को, संवर रही थी आईने में खुद को
मुंदी पलके, महके गुसू, सुर्ख लबों के लगे कुछ हिले हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
पलट चुकी थी लीए अंगडाई, नजरें मिली थी शामत आई
हलकी मुस्कान जैसे दिल पे दस्तक थी और अरमां जगे हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
वो ही नहीं कायनात भी दिल पर हावी थी
चल रही थी कुछ ऐसी पुरवाई, दिल के काबू ढीले हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
सैनपाल 'साथी'
कोई गम नहीं, जमाना जो हमें गुनाहगार कहे
देखा जब उस हसीना को, संवर रही थी आईने में खुद को
मुंदी पलके, महके गुसू, सुर्ख लबों के लगे कुछ हिले हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
पलट चुकी थी लीए अंगडाई, नजरें मिली थी शामत आई
हलकी मुस्कान जैसे दिल पे दस्तक थी और अरमां जगे हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
वो ही नहीं कायनात भी दिल पर हावी थी
चल रही थी कुछ ऐसी पुरवाई, दिल के काबू ढीले हुए
हो गयी मुहब्बत तो, ऐसे क्या गुनाह हुए
सैनपाल 'साथी'
दाग जो तेरें आस्तीन के...
हर कोई ये कहेगा कि हम ही तेरें काबिल न थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
सुना था सागर सी गहरी जनानत, तुने कश्म-कश पाले थे
भेद भी आपसी जो तुने लबों से गिराए थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
दबी दबी सी बातें हर महफ़िल में, तेरी अगुवाई के राग थे
उमीदों के घरौंदें जो तुने खुद हांथों से जलाये थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
अबकी हर रंज गरीबाँ में बैठा है, ऐतबार न जूठा पाए थे
टूटे सपनों के बहाव में रश्मो-रिश्तों के मलबे बहे पाए थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
दिल में थी कशिश गर हर जहर को उगल देती, मेरे दर तो खुले थे
तेरे आंसू यूँ जाया करते, हम इतने भी संगदिल न थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
सैनपाल 'साथी'
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
सुना था सागर सी गहरी जनानत, तुने कश्म-कश पाले थे
भेद भी आपसी जो तुने लबों से गिराए थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
दबी दबी सी बातें हर महफ़िल में, तेरी अगुवाई के राग थे
उमीदों के घरौंदें जो तुने खुद हांथों से जलाये थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
अबकी हर रंज गरीबाँ में बैठा है, ऐतबार न जूठा पाए थे
टूटे सपनों के बहाव में रश्मो-रिश्तों के मलबे बहे पाए थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
दिल में थी कशिश गर हर जहर को उगल देती, मेरे दर तो खुले थे
तेरे आंसू यूँ जाया करते, हम इतने भी संगदिल न थे
दाग जो तेरें आस्तीन के थे, मेरे दिल में छुपाये थे
सैनपाल 'साथी'
हे राम ...
हे राम
बस इतना बता दे
कौन अपना है
गैर कौन है
मुद्दतों से जो कहते है मेरे अपने है
नामों निशान तक न रखने के खल करते है
सच कहता हूँ इसे से दिल को पल पड़ते है
हमें उस आयाम पे देखना रास न आया उन्हें
तनहा रुह तनहा जिगर खून भरे सिलें मिले
हमें उनकी झेलने की अदा ने कायल किया है
हद से ज्यादा जज्बात ने घायल किया है
धीमी धीमी चुभन को नजर अंदाज़ जो किया हमने
बैद्य ने क्या खूब कहा बगल में गढा छुरा पाया है
कैसे हम किसी पर शक करे
सभी तो अपने ठहरे गैर किसे करें
हे राम
फिर सवाल किये जा रहा हूँ तुम से
मनुष्य इतना जले क्यूँ है मन से
क्या इस कमी को
अगले उत्क्रांत में उकड नहीं सकतें जड़ से
कायदे कानून से जुडी मनुष्य जात
प्रकृति के नियमों को भूली तो नहीं
जो बड़ा, खडा हो जाये दूसरों के सीने पर
तो इन्सान अलग कैसे जानवर जात से
आये दिन वारदात होते रहते है
हर कोई हर एक का हक़ छिनते रहतें हैं
मैं हिन्दू, मैं मुसलमान तो कोई शिख ईसाई है
हे राम
क्या ये सब इन्सान नहीं है
एक दूजे के अपने नहीं है
सैनपाल 'साथी'
बस इतना बता दे
कौन अपना है
गैर कौन है
मुद्दतों से जो कहते है मेरे अपने है
नामों निशान तक न रखने के खल करते है
सच कहता हूँ इसे से दिल को पल पड़ते है
हमें उस आयाम पे देखना रास न आया उन्हें
तनहा रुह तनहा जिगर खून भरे सिलें मिले
हमें उनकी झेलने की अदा ने कायल किया है
हद से ज्यादा जज्बात ने घायल किया है
धीमी धीमी चुभन को नजर अंदाज़ जो किया हमने
बैद्य ने क्या खूब कहा बगल में गढा छुरा पाया है
कैसे हम किसी पर शक करे
सभी तो अपने ठहरे गैर किसे करें
हे राम
फिर सवाल किये जा रहा हूँ तुम से
मनुष्य इतना जले क्यूँ है मन से
क्या इस कमी को
अगले उत्क्रांत में उकड नहीं सकतें जड़ से
कायदे कानून से जुडी मनुष्य जात
प्रकृति के नियमों को भूली तो नहीं
जो बड़ा, खडा हो जाये दूसरों के सीने पर
तो इन्सान अलग कैसे जानवर जात से
आये दिन वारदात होते रहते है
हर कोई हर एक का हक़ छिनते रहतें हैं
मैं हिन्दू, मैं मुसलमान तो कोई शिख ईसाई है
हे राम
क्या ये सब इन्सान नहीं है
एक दूजे के अपने नहीं है
सैनपाल 'साथी'
Friday, October 23, 2009
शै-ए-नैन की...
शै-ए-नैन की जो बात होती है
हुर का नूर दिल का सुरूर याद आतें है
आंखे है या मै के प्याले भरें
चारो सू लगे है पहरें
डूबे जो इनमे नस्फ़-शब के महताब याद आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
तेरी पलकों के सायें में छिपे अस्म कई
तेरी अश्क ने सिखाएं है इल्म कई
गिरे जो इनसे दिन में अंजुम नजर आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
मौसम जो खुश्क हुए
नैन में काजल नजर आता है
फिजाओं में जो रज घुल गए
अखियों में बादल नजर आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
चंचल है नैन तेरें की मिजजें फर्क
हर उठी नजर में मेरे कई कद नजर आतें है
आँखों के नूर में मन के दरश याद आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
हुर का नूर दिल का सुरूर याद आतें है
सैनपाल 'साथी'
हुर का नूर दिल का सुरूर याद आतें है
आंखे है या मै के प्याले भरें
चारो सू लगे है पहरें
डूबे जो इनमे नस्फ़-शब के महताब याद आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
तेरी पलकों के सायें में छिपे अस्म कई
तेरी अश्क ने सिखाएं है इल्म कई
गिरे जो इनसे दिन में अंजुम नजर आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
मौसम जो खुश्क हुए
नैन में काजल नजर आता है
फिजाओं में जो रज घुल गए
अखियों में बादल नजर आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
चंचल है नैन तेरें की मिजजें फर्क
हर उठी नजर में मेरे कई कद नजर आतें है
आँखों के नूर में मन के दरश याद आतें है
शै-ए-नैन की जो बात होती है
हुर का नूर दिल का सुरूर याद आतें है
सैनपाल 'साथी'
बरसो गुजर गए...
बरसो गुजर गए जब तुम हमे मिले थे
क्या हम याद करे की सौ सौ गुल खिले थे
उमड़ आई थी तमन्ना मोहबतें फ़ना हो गयी
हम अभी तक समजे नहीं है क्या बात थी हुई
न हालत न बात न वक़्त अब रहा है वही
तो मै कैसे यकीं करू की तुम हो थमी वही
यादों से परदे उठा कर तुम देखती तो होगी कही
कोई तिनका तेरे पहचान का उडा हवा में तो नहीं
क्यूँ तुम भुलाते नहीं 'साथी' वो मंजरें हिज्र
वक़्त कभी मुट्ठी में पकड़ सका है कोई
सैनपाल 'साथी'
क्या हम याद करे की सौ सौ गुल खिले थे
उमड़ आई थी तमन्ना मोहबतें फ़ना हो गयी
हम अभी तक समजे नहीं है क्या बात थी हुई
न हालत न बात न वक़्त अब रहा है वही
तो मै कैसे यकीं करू की तुम हो थमी वही
यादों से परदे उठा कर तुम देखती तो होगी कही
कोई तिनका तेरे पहचान का उडा हवा में तो नहीं
क्यूँ तुम भुलाते नहीं 'साथी' वो मंजरें हिज्र
वक़्त कभी मुट्ठी में पकड़ सका है कोई
सैनपाल 'साथी'
काँटों से दमन...
काँटों से दमन तोड़ते है सभी, हैरत तो नहीं
हम तो काँटों के लिए ही बने उनसे गैरत नहीं
इंतजार में नैन गढे तुम नजर आओगी कही
इतना तो बता के जाती सावन आने को नहीं
हम साहिल जो ठहरे लहरों की टकरें सही
अब के बिछुडे तो मिलने की उमीदें है नई
चुपचाप से अनजान चेहरों में नजर तुम्हे ढूँढती रही
फिर न मिलियत की चुभन से अश्क बार होती रही
जान चूका है राज-ए-मोहब्बत ये गली मोहल्ला, ओ हरजाई
उठेंगी कई उंगलिया तेरी तरफ नामें बेवफाई
दाग दामन पर लगे और नजरें जो मैली हुई
हमने तो कब की दुनिया छोड़ी खाक लाश ही रही
सैनपाल 'साथी'
हम तो काँटों के लिए ही बने उनसे गैरत नहीं
इंतजार में नैन गढे तुम नजर आओगी कही
इतना तो बता के जाती सावन आने को नहीं
हम साहिल जो ठहरे लहरों की टकरें सही
अब के बिछुडे तो मिलने की उमीदें है नई
चुपचाप से अनजान चेहरों में नजर तुम्हे ढूँढती रही
फिर न मिलियत की चुभन से अश्क बार होती रही
जान चूका है राज-ए-मोहब्बत ये गली मोहल्ला, ओ हरजाई
उठेंगी कई उंगलिया तेरी तरफ नामें बेवफाई
दाग दामन पर लगे और नजरें जो मैली हुई
हमने तो कब की दुनिया छोड़ी खाक लाश ही रही
सैनपाल 'साथी'
बाँहों में सिमट लेना...
जिंदगी, बाँहों में सिमट लेना अब जिया न जाये
न कस आगोश में यूँ हमें कि दम निकल जाये
हो गयी बौछारें बादल गरजतें बरसतें रहे
ठिठक रहे हैं ठण्ड से कि नब्ज न जमी रहे
याद न किया रब को अब मन ही मन शरमायें
गिरे है बिजली जो, साँसों तले बुझतें शोलें पाए
उड़ कर चाँद छुने कि कोशिश में होश न रहे
फिर भी न मालूम हुई अपनी उडानों कि सीमाएं
संभल रखे है कई अफताब कि राहें रोशन हो जायें
जो किये है मकाम हासिल अब मन को न बहलाए
सैनपाल ' साथी'
न कस आगोश में यूँ हमें कि दम निकल जाये
हो गयी बौछारें बादल गरजतें बरसतें रहे
ठिठक रहे हैं ठण्ड से कि नब्ज न जमी रहे
याद न किया रब को अब मन ही मन शरमायें
गिरे है बिजली जो, साँसों तले बुझतें शोलें पाए
उड़ कर चाँद छुने कि कोशिश में होश न रहे
फिर भी न मालूम हुई अपनी उडानों कि सीमाएं
संभल रखे है कई अफताब कि राहें रोशन हो जायें
जो किये है मकाम हासिल अब मन को न बहलाए
सैनपाल ' साथी'
ये लोग...
ये लोग भी क्या लोग हैं
हर कदम रोये हर बात पे सोग हैं
आते है, आने पर कोई बंदिश नहीं
क्या बातें नक्शा छोडेंगें इतला भी नहीं
दिल-ऐ-खलबली मचा देते हैं
ये लोग...
सुनाते है अपने गमें-हालत की दास्ताँ
बयां उनका ख़यालात बदल देते हैं
दिलें-गुमान कर देतें हैं
ये लोग...
रही बात दबके जुबान खामोश है
कोई करता ख्याल गर फटे झोली
वो करते हैं दिल खाली, 'साथी' दिल भर आते है
ये लोग...
सैनपाल 'साथी'
हर कदम रोये हर बात पे सोग हैं
आते है, आने पर कोई बंदिश नहीं
क्या बातें नक्शा छोडेंगें इतला भी नहीं
दिल-ऐ-खलबली मचा देते हैं
ये लोग...
सुनाते है अपने गमें-हालत की दास्ताँ
बयां उनका ख़यालात बदल देते हैं
दिलें-गुमान कर देतें हैं
ये लोग...
रही बात दबके जुबान खामोश है
कोई करता ख्याल गर फटे झोली
वो करते हैं दिल खाली, 'साथी' दिल भर आते है
ये लोग...
सैनपाल 'साथी'
बड़े अर्से से...
बड़े अर्से से उनका पैगाम आया है
कहाँ रखा था वो जाम याद आया है
सोचा न था कभी उनको भी याद आएगी
बहुत दिन हुए बिझाली नही गिरी थी
उभरे नही है जलते मंजर से
देखे है जां बाकी है या रहा साया है
कहाँ रखा था...
झुल्फों की घटाओं में गुप्त कर दिया हमें
नजरों में कैद कत्ल कर डाला हमें
क्या हुआ जालिम खुनें- आंसू रोया है
अँखियाँ तरसती यादें कलश न बहाया है
कहाँ रखा था...
आज मैखाने खाली नही होंगे मैकाशों की भीड़ में
दिल का खालीपन डुबो-डुबो कर भरेंगे जाम में
कितने दिन पीती थी मुझे,तरस नही खायेंगे जाम पर
नशें-अंजुमन में चलें 'साथी' सारी रात बाकी है
कहाँ रखा था..
सैनपाल 'साथी'
कहाँ रखा था वो जाम याद आया है
सोचा न था कभी उनको भी याद आएगी
बहुत दिन हुए बिझाली नही गिरी थी
उभरे नही है जलते मंजर से
देखे है जां बाकी है या रहा साया है
कहाँ रखा था...
झुल्फों की घटाओं में गुप्त कर दिया हमें
नजरों में कैद कत्ल कर डाला हमें
क्या हुआ जालिम खुनें- आंसू रोया है
अँखियाँ तरसती यादें कलश न बहाया है
कहाँ रखा था...
आज मैखाने खाली नही होंगे मैकाशों की भीड़ में
दिल का खालीपन डुबो-डुबो कर भरेंगे जाम में
कितने दिन पीती थी मुझे,तरस नही खायेंगे जाम पर
नशें-अंजुमन में चलें 'साथी' सारी रात बाकी है
कहाँ रखा था..
सैनपाल 'साथी'
मेरे अंग...
मेरे अंग, मेरी सूरत पे मत जाना
बहुत बुरे दिखतें हैं
ठहकतें हसतें मुस्कुरातें नहीं पाओगे
मुर्झें हुयें लगतें हैं
माना की कई ए़ब हैं हम में
मन मोह लेने का हुनर रखतें है
आगे और क्या कहें दिल सोज़
पौलादी सिने पिघला सकतें है
सैनपाल 'साथी'
बहुत बुरे दिखतें हैं
ठहकतें हसतें मुस्कुरातें नहीं पाओगे
मुर्झें हुयें लगतें हैं
माना की कई ए़ब हैं हम में
मन मोह लेने का हुनर रखतें है
आगे और क्या कहें दिल सोज़
पौलादी सिने पिघला सकतें है
सैनपाल 'साथी'
आओ फिर भी...
आओ फिर भी फिजाओ हालतें रंजिश में
खिल न सकेंगे गुल कि वो आएंगे बाद में
उठा सका है कोई पर्दा सान्जें मन से
दिल रहा खाली खाली बेसब्र हवाओं से
घुमड़ कर आयेंगे बादलों के साये कभी
तेरी यादों अश्कों में बह जायेगी रुत तभी
ताकतें छानतें रहें वापसी की हर मुमकिन डगर
न रुसवा होती जिंदगियां वो मिल जातें अगर
सैनपाल 'साथी'
खिल न सकेंगे गुल कि वो आएंगे बाद में
उठा सका है कोई पर्दा सान्जें मन से
दिल रहा खाली खाली बेसब्र हवाओं से
घुमड़ कर आयेंगे बादलों के साये कभी
तेरी यादों अश्कों में बह जायेगी रुत तभी
ताकतें छानतें रहें वापसी की हर मुमकिन डगर
न रुसवा होती जिंदगियां वो मिल जातें अगर
सैनपाल 'साथी'
ये बेदर्द ज़माने से...
ये बेदर्द ज़माने से मेरी एक न चली
कितने शिकवे थे, हाय! मेरी एक न चली
बीच तुफां समुन्दर में बे-राह नांव चली
माजी लढता रहा उसकी एक न चली
आई कितनी बहारें फूल हजार खिले
जातें मौसम को रोकतें, मेरी एक न चली
बेताल थी दुनिया भागती दौड़ती रही
वक्त की रफ्तार रोकतें, मेरी एक न चली
अनजान न समझ सकें दुनिया के दस्तूर को
कोशिशे-हमकदम में 'साथी' एक न चली
सैनपाल 'साथी'
कितने शिकवे थे, हाय! मेरी एक न चली
बीच तुफां समुन्दर में बे-राह नांव चली
माजी लढता रहा उसकी एक न चली
आई कितनी बहारें फूल हजार खिले
जातें मौसम को रोकतें, मेरी एक न चली
बेताल थी दुनिया भागती दौड़ती रही
वक्त की रफ्तार रोकतें, मेरी एक न चली
अनजान न समझ सकें दुनिया के दस्तूर को
कोशिशे-हमकदम में 'साथी' एक न चली
सैनपाल 'साथी'
तेरा वापस न...
तेरा वापस न आना गर तय था
तो लम्हें-इंतजार का अफसोस न होता
दिल में क्या था गर मालूम होता
तो इतने दिन जाया किए, गम न होता
पंखडियों में बंध होने का एहसास भी होता
तो यूं पहलू में आने की कोशिश न करता
गेसुओं के उलझाव ने यूं आँखों में अँधेरा न भरा होता
तो दिल पे किए सितम का दर्दें-एहसास न होता
सालों गुजर जातें हैं एक मुलाकात के बाद गर
तो दोस्तों के हांथों पैगाम न भेजता
कल तू वादों पे कायम रही होती तो
आज मेरी जिंदगी में कुछ तो बदलाव होता
सैनपाल 'साथी'
तो लम्हें-इंतजार का अफसोस न होता
दिल में क्या था गर मालूम होता
तो इतने दिन जाया किए, गम न होता
पंखडियों में बंध होने का एहसास भी होता
तो यूं पहलू में आने की कोशिश न करता
गेसुओं के उलझाव ने यूं आँखों में अँधेरा न भरा होता
तो दिल पे किए सितम का दर्दें-एहसास न होता
सालों गुजर जातें हैं एक मुलाकात के बाद गर
तो दोस्तों के हांथों पैगाम न भेजता
कल तू वादों पे कायम रही होती तो
आज मेरी जिंदगी में कुछ तो बदलाव होता
सैनपाल 'साथी'
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