Tuesday, November 3, 2009

तुम इतनी हसीन ...

तुम इतनी हसीन हो कि मैं तुम्हें प्यार कर नहीं सकता
गिला ये है कि मैं तेरे नसीब तक खुद को उठा नहीं सकता

यक-ब-यक सामने आना हरम सुने लगे है
इन्सान हूँ खुद का इताब कर नहीं सकता

महताबे किरन हसी सही चादर बना के सोया नहीं जाता
महसूस तो होता है पर तकदीर तो नहीं बनाया जाता

हुस्ने कँवल खिले जो बेवक्त हवा उसे कुम्लाहा सकती है
मैं कोई गुलदस्ता तो नहीं हूँ जो उसे सजा सकता

गुलिस्तां है खुशबू का बसेरा, मेरी बस्ती मुनासिफ नहीं है
मैं कोई फिजा तो नहीं हूँ जो खुशबू समां सकता

हर शै अपनी पहचान खो दे गर मेरे साये में आ जाती है
यूँ तुझे मिटाकर ये 'साथी' अपनी दुनिया बसा नहीं सकता

सैनपाल 'साथी'

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