Tuesday, November 3, 2009

बीते हुए दिन

बीते हुए दिन मिले भी तो क्या पायेगा
चंद बिखरे फूल, साये खिजां में पायेगा

मिले नहीं थे खुद से सब्रे करार में कभी
रह गयी है जिंदगी कोरी, न लिखी अभी

मुसव्विर से क्या गिला, तस्वीर बेमिसाल थी
जिससे रंग उड़ गए ये मेरे नसीब की स्याही थी

पुछ रहा है हर अस्म, क्या थे, कहाँ खोये थे
चिरादां थी जिंदगी, तमन्ना के रोशनदां न थे

तुम समझा रहे हो अभी, थोडा पहले मिल जाते
पत्थर पे पानी की बूंद, जमीर तो जगे होते

फुले हुए फूल से जलन क्यूँ रखे, 'साथी'
मुर्झे हुए मन की कभी सुलग नहीं होती

सैनपाल 'साथी'

2 comments:

  1. Dear Sainpal,
    Today first time read your gazals on blog.Great yaar,be keep it up.Update your marathi poems on blog.
    Best Regards,
    SAPKAL J.R.

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